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VOL. 3, ISSUE 10 (2016)
सामाजिक त्रासदी का शिकार युवा वर्ग और बचाव के उपाय
Authors
डा. सुदर्शन राठी
Abstract
प्रस्तुत शोध पत्र में अंधी गलियों में भटकते युवा वर्ग के प्रति चिंता दर्शान का प्रयास किया गया है। आज का युग जहाॅ विचारों के अंगीकरण, औद्योगिक क्रान्ति, सूचना तन्त्र के विकास, आवागमन के साधनों, राजनीतिक व्यवस्था, आर्थिक व्यवस्था, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की संस्कृति से संघर्ष, नित नयी वैज्ञानिक खोजों का युग है, वहीं तीव्र गति से आगे बढ़ने की प्रतिस्पर्धा, माता-पिता की बच्चों के बढ़ती महत्त्वाकांक्षा, भागा-दौड़ी के युग में युवा वर्ग में तनाव, आक्रोश, घुटन, संत्रास, मन-मुटाव, अलगाव का भाव भी बढ़ता जा रहा है। दिन पर दिन हत्या, मार-काट, लूट-पाट, छीना झपटी, विवाह-विच्छेद और आत्महत्या जैसी घातक सामाजिक त्रास्दियाँ युवाओं को खोखला करती जा रही हैं। युवा वर्ग अनेक शारीरिक व मानसिक रोगों का शिकार होता जा रहा है। निरन्तर पैसे का चुम्बक उन्हें अपनी ओर खींचता जा रहा है। युवा संस्कार विहीन होते जा रहे हैं। संयुक्त परिवार तो टूट ही चुके हैं, एकल परिवार भी दरकते जा रहे हैं। लगभग अधिकतर परिवार एक छत के नीचे रहते हुए भी आधे-अधूरे हो चुके हैं। युवा अनेक प्रकार के नशे का शिकार होकर अंधी गलियों में खो चुका है।
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Pages:202-204
How to cite this article:
डा. सुदर्शन राठी "सामाजिक त्रासदी का शिकार युवा वर्ग और बचाव के उपाय". International Journal of Multidisciplinary Research and Development, Vol 3, Issue 10, 2016, Pages 202-204
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