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VOL. 3, ISSUE 1 (2016)
जाति उन्मूलन संबंधी बच्चन के विचार
Authors
डाॅ. गीता यादव
Abstract
विज्ञान और तकनीक की पराकाष्ठा के युग में भी, भारतीय समाज आज तक अनेकोंनेक अंधविश्वासों और सामाजिक बुराईयों से जूझ रहा है। उनमें से एक है - जाति-प्रथा। समाज के वास्तविक बुद्धिजीवियों, हृदयजीवियों और समाज-सुधारकों को भारतीय समाज में व्याप्त यह बुराई सदा से ही सालती रही। डॉ बच्चन की आत्मकथा के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि वे इस कुप्रथा के मात्र दृष्टा नही थे, वे भोक्ता भी थे और चिंतक भी थे। वे इस बुराई पर सिर्फ क्षोभ और दुख प्रकट करके नही रह जाते, सिर्फ चिंता प्रकट करके भी नही रह जाते अपितु चिंतन भी करते हंै और व्यक्तिगत, राजनीतिक और व्यवस्था के स्तर पर समाधान भी प्रस्तुत करते हेैं।
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Pages:368-370
How to cite this article:
डाॅ. गीता यादव "जाति उन्मूलन संबंधी बच्चन के विचार". International Journal of Multidisciplinary Research and Development, Vol 3, Issue 1, 2016, Pages 368-370
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