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VOL. 5, ISSUE 4 (2018)
रीवा नगर के नगरीय परिवेश में संयुक्त परिवार के बदलते प्रतिमान का एक सामाजिक अध्ययन
Authors
रेखा शुक्ला, डाॅ0 यू0 पी0 सिंह
Abstract
वास्तव में नगरीकरण की प्रवृत्ति उतनी ही पुरानी है जितनी सभ्यता, फिर भी इसका व्युत्पत्तिमूलक समगुण एक ऐसी सच्चाई को प्रकट करता है, जिसको सही तरह से पहचाना नहीं जा सकता है। अनेक विद्वानों ने नगरीकरण को परिभाषित करने की चेष्ठा की है। फैडरिक रेटजेल ने शहर को एक लगातार और घना, लोगों एवं मकानों का ऐसा जमघट कहा है जिसके अन्तर्गत विस्तृत भूमि हो और वहाँ वृहद व्यापारिक मार्गों का संगम हो। वर्तमान समय में नगरीकरण की प्रवृत्ति बढ़ी है। लोगों का पलायन गाँव से शहर की ओर हुआ है। इन सबका प्रमुख कारण, औद्योगिकरण। वास्तव में शहर वह बस्ती है, जिसका जन्म अचानक ही नहीं हो जाता बल्कि कुछ निश्चित कार्यों व सेवाओं की उपलब्धता के कारण ही वह शहर का रूप धारण कर पाती है। नगरीकरण की प्रवृत्ति परिवर्तनशील है क्योंकि शहर अभी विकास की अवस्था में है। विभिन्न क्षेत्रों में इसके विकास की दशा भी समान नहीं है। संयुक्त परिवार के सम्बन्धियों के पारस्परिक सम्बन्ध में औपचारिकता और कटुता का प्रवेश हो रहा है तथापि अभी भी अधिकांश परिवारों में घनिष्ठ और औपचारिक सम्बन्ध बने हुए हैं।
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Pages:95-98
How to cite this article:
रेखा शुक्ला, डाॅ0 यू0 पी0 सिंह "रीवा नगर के नगरीय परिवेश में संयुक्त परिवार के बदलते प्रतिमान का एक सामाजिक अध्ययन". International Journal of Multidisciplinary Research and Development, Vol 5, Issue 4, 2018, Pages 95-98
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