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VOL. 4, ISSUE 4 (2017)
भारत की परम्पराओं: विधवा पुनर्विवाह में फंसी नारी
Authors
डाॅ0 अर्चना मिश्रा
Abstract
ऋग्वेद में विधवा शब्द का प्रयोग अनेक बार हुआ है। बौधायन धर्मसूत्र में उल्लेख मिलता है कि विधवा को एक वर्ष तक मधु, मांस, मदिरा तथा नमक का सेवन नहीं करना चाहिए तथा भूमिशयन करना चाहिए। मनुस्मृति के अनुसार पति की मृत्यु के बाद विधवा को पुष्प, फल एवं मूल खाकर शरीर को गला देना चाहिए। किसी अन्य व्यक्ति का नाम भी नहीं लेना चाहिए। मृत्युपर्यंत संयम, व्रत, सतीत्व की रक्षा करते हुए पतिव्रता के सदाचरण एवं गुणों की प्राप्ति की चेष्टा करनी चाहिए। यदि विधवा अविवाह के नियम पर चलते हुए सतीत्व की रक्षा करती रहे तो वह पुत्रहीन होते हुए भी स्वर्ग को प्राप्त कर सकती है। जैसा कि प्राचीन नैष्ठिक ब्रह्मचारी सनक ने किया था। कात्यायन ने पत्नी को पति के संपत्ति का मृत्युपर्यंत अधिकारी माना हैं उसे दान आदि कर स्वर्ग प्राप्ति का विधान किया है।
वृद्धहारीत के अनुसार विधवा को बाल नहीं संवारना चाहिए। पान, गंध, पुष्प आभूषण एवं रंगीन परिधान का प्रयोग नहीं करना चाहिए। पीतल, कांसे के बर्तन में भोजन न करे। दो बार भोजन करे। अंजन का प्रयोग न करते हुए श्वेत वस्त का उपयोग करे। इंद्रियों एवं क्रोध का दमन करना चाहिए। भगवान की आराधना करें। रात्रि में पृथ्वी पर कुश की चटाई पर शयन करे। मनोयोग एवं सतसंगत में लगा रहना चाहिए।

ताम्बूलाभ्यज्जनं चैव कांस्यपात्रे चभोजनम्।
यतिश्च ब्रह्मचारी च विधवा च विवर्जयेत।।

हर्षरचित में उल्लेख मिलता है कि विधवायें आँख में अंजन, मुख पर पीला लेप नहीं करती थीं। अपने बालोें को ऐसे ही बांध लेती थीें। विधवा को अमंगल सूचक माना जाता था। विधवा का आशीर्वाद कोई विज्ञजन ग्रहण नहीं करता मानो वह सर्प विष हो। विधवा के कबरीबंध (केशबंध) से पति बंधन में पड़ता है। अतः विधवा को अपना सिर मुंडित रखना चाहिए। एक बार भोजन, मास भर उपवास तथा चंद्रायण व्रत रखना चाहिए। विधवा का पर्यन्क शयन पति को नरकगामी बनाता है। उसे सुगंधित लेप से दूर रहना चाहिये। विधवा को प्रतिदिन तिल, जल, कुश से पति, पिता के पिता तथा पति के पितामह के नाम एवं गोत्र से तर्पण करना चाहिए। उसे मरते समय भी बैलगाड़ी में नहीं बैठना चाािहए। कंचुकी नहीं पहननी चाहिए। रंगीन परिधान नहीं धारण करना चाहिए। वैशाख, कार्तिक एवं माघ मास में विशेष व्रत रखना चाहिए।
निरुक्त में विधावनाद व इति चर्मशिराः में चर्मशिराः को मुंडित विधावा का द्योतक मानते हैं। इसी प्रकार आरस्तम्बमंत्र पाठ में विकेशी शब्द का अर्थ मुंडित विधवा किया गया है।
पी.के. काणे उपर्युक्त अर्थ को युक्ति संगत नहीं मानते उसके अनुसार विधवा का मुंडन शास्त्रसंगत नहीं है। पी.के. काणे के अनुसार मुंडन की प्रथा 10वीं एवं 11वीं शताब्दी से आरंभ हुई। कालांतर में विधवाएँ यतियों के समान मानी जाने लगीं। यति लोग अपना सिर मुड़ाया करते थे। अतः विधवाएँ भी वैसा करने लगीं। चुल्लवर्ग से ज्ञात होता है कि बौध साधुनिया (भिच्छुणियां) सिर से केश कटा डालती थीं और नारंगी रंग की (विच्छिल) परिधान धारण करती थीं। इस प्रथा से मुंडन की प्रथा को बल मिला होगा। जैन साधुनियाँ अपने केश काट डालती थीं या उन्हें नोच डालती थीं।
विधवा का सांसरिक जीवन में रहना संभव न होने के कारण साधु के समान त्यागमय जीवन का विधान किया गया होगा। यदि वे श्रृंगार का प्रयोग करती, आकर्षक दिखाई देती, तो अनेक अनैतिक प्रश्न उपस्थित होने की आशंका थी। अमंगल घोषित करने से विधवा से एक प्रकार की दूरी बनी रहती थी।
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Pages:258-261
How to cite this article:
डाॅ0 अर्चना मिश्रा "भारत की परम्पराओं: विधवा पुनर्विवाह में फंसी नारी". International Journal of Multidisciplinary Research and Development, Vol 4, Issue 4, 2017, Pages 258-261
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