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VOL. 4, ISSUE 4 (2017)
निरालाः छायावाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
Authors
डाॅ0 मनीषा शुक्ला
Abstract
छायावादी काव्य में राष्ट्रीय भावना का तीव्र स्वर मुखरित हुआ है। इस युग में तत्कालीन स्वातंत्र्य-चेतना का पूरा प्रभाव दिखायी देता है। ध्यातव्य है कि हिन्दी साहित्य में छायावादी काव्य का उदय और अस्त उस युग में हुआ था, जब भारत में अंग्रेजों का अखण्ड राज्य था और देश में स्वतंत्रता का आन्दोलन पूरी शक्ति के साथ चल रहा था। उस समय छायावादी कवियों ने राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत अनेक गीतों का सृजन किया। इतना ही नहीं, माखनलाल चतुर्वेदी, सुभद्रा कुमारी चैहान, नवीन आदि कवियों ने राष्ट्रीय आन्दोलन में खुलकर भाग भी लिया। माखन लाल चतुर्वेदी की ‘‘हिमकिरीटिनी’’, ‘‘हिमतरंगिनी’’ की अधिकांश कविताएँ विलासपुर सेन्ट्रल जेल में लिखी गयी थीं। निराला हिन्दी साहित्य में मनुष्य की कर्मठता, वीरता, धैर्य, आन्तरिक द्वंद्व, उसकी अपार जिजीविषा के चित्रकार हैं। निराला का मानवतावाद हिन्दी साहित्य में उनके अभ्युदयकाल से आरम्भ होता है और अन्तिम दौर तक निरन्तर गहरा होता जाता है। निराला ने साहित्य में जिस मानवतावाद की प्रतिष्ठा की, उसके विकास का इतिहास भारतीय जन-आन्दोलन के उतार-चढ़ाव का इतिहास है। पहले दौर में निराला उस विप्लवी वीर के गीत गाते हैं जिसमें अतिमानव की झलक है।
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Pages:253-257
How to cite this article:
डाॅ0 मनीषा शुक्ला "निरालाः छायावाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि". International Journal of Multidisciplinary Research and Development, Vol 4, Issue 4, 2017, Pages 253-257
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