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VOL. 4, ISSUE 11 (2017)
प्राचीन भारतीय इतिहास में धर्मशास्त्रीय एवं अर्थशास्त्रीय परम्परा में नारियों का सम्पत्तिक अधिकार का अध्ययन
Authors
डाॅ0 जितेन्द्र मिश्र
Abstract
धर्म उन संस्कृत शब्दों में है जिनका प्रयोग कई अर्थों में होता आया है। यह शब्द ‘धृ’ धातु से बना है, जिसका तात्पर्य है धारण करना, आलम्बन देना, पालन करना। इस तरह धर्मशास्त्रों का कार्य है वर्णों एवं आश्रमों के धर्मों की शिक्षा देना। धर्मशास्त्रों में स्त्रियों कि सम्पत्ति सम्बन्धी अधिकार दिये हुये है। स्त्री धन के स्वरूप और उनके ज्ञान तथा अन्य प्रकार के सम्पत्ति सम्बन्धी विवेचना प्रस्तुत है, जिस पर स्त्रियों की निर्भरता दिखाई देती है। स्त्रीधन वह सम्पत्ति है जिस पर पत्नी का पूर्ण अधिकार होता है और उह उसका उपभोग भी कर सकती है। ऐसी मान्यता है कि वैदिक युग में कन्या को विवाह में दिए जाने वाले दहेज से स्त्रीधन की उत्पत्ति हुई। स्त्रीधन पूर्णतः स्त्रियों के स्वामित्व में था, जिसे वह आवश्यकता पड़ने पर बेंच भी सकती थी। परन्तु व्यवस्थाकारों ने कुछ नियम इस तरह भी बनाए कि कुछ भाग पर परिवार या पति का नियन्त्रण रहें, जिसे वह बेंच नही सकती थी। स्त्रीधन के लिए उत्तराधिकार के नियम भी है। प्रत्येक युग में स्त्रीधन का उत्तराधिकार भारतीय विधान का सबसे जटिल अंग रहा है। इसलिए कभी भी उसकी एक रूप व्यवस्था नहीं हो सकी।
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Pages:213-215
How to cite this article:
डाॅ0 जितेन्द्र मिश्र "प्राचीन भारतीय इतिहास में धर्मशास्त्रीय एवं अर्थशास्त्रीय परम्परा में नारियों का सम्पत्तिक अधिकार का अध्ययन". International Journal of Multidisciplinary Research and Development, Vol 4, Issue 11, 2017, Pages 213-215
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