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VOL. 4, ISSUE 10 (2017)
बघेलखण्ड के सेंगरों का सांस्कृतिक अनुशीलन
Authors
डाॅ0 सुमन तिवारी
Abstract
छठी शताब्दी के अंतिम चरण में गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद भारतीय इतिहास के एक महान युग का अन्त हो गया। गुप्त सामा्रज्य के पतन के बाद भारत के विभिन्न भागो में राजनीतिक सत्ता के अनेक स्वतंत्र केन्द्रो का उदय हुआ 1 और इसके साथ ही भारत की राजनीति में बहुराज्यवादी व्यवस्था अपने दुर्गुणों सहित प्रारम्भ हुई।
यद्यपि हर्ष ने जिसकी राजनीतिक शक्ति का केन्द्र कन्नौज था ने उत्तर भारत की राजनीतिक एकता को अक्षुण्य बनाये रखने का प्रयास किया लेकिन उसकी मृत्यु (647ई.) के बाद उसका राज्य व उत्तर भारत की एकता दोनो नष्ठ हो गई। फलस्वरूप अनेक आन्तरिक सामन्त, अधिनस्थ राज्य व ब्राह्रा शक्तियों ने नवीन राज्य व राज्य वंश की स्थापना की।
इन नवीन शासक वर्गो का भारतीय इतिहास में राजपूत नाम से पदार्पण हुआ जो अपनी विशेष सामाजिक व्यवस्था क्लेन (कुल)4 से बंधे हुऐ थे। हर कुल अपने को एक सामान्य पूर्वक का वंशज बताता था फिर चाहे वह पूर्वज वास्तविक रहा हो या काल्पनिक। एक कुल की सामान्यतः एक परस्पर संबंध क्षेत्र में प्रधानता होती थी और ये ज्यादातर 12 या 24 अथवा 48 या 84 गावों की इकाइयों मे होते थेे।2 राजपूतो के अनेक कुलोे का उल्लेख भारतीय इतिहास में मिलता हैं जैंसे प्राचीन ग्रन्थ कुमारपाल चरित एवं वर्ण रत्नाकर आदि में पराम्परागत 36 राजपूत कुलो की सूची मिलती हैं एवं राजतंरगणी में 36 राजपूत कुलो का उल्लेख हंैं यद्यपि इसकी सूची में भिन्नता मिलती है परन्त राजपूतो से संबंधित हर ग्रन्थ में यह समानता हैं कि प्रत्येक में इसकी संख्या 36 का ही उल्लेख मिलता है।3 अतः स्पष्ट होता है राजपूतो के छत्तीस कुल थे लेकिन ये सूचियां इस ढंग से बनाई गई थी कि इनमें परिवर्तन संभव रहा। इन कुलो के राजपूत ज्यादातर कही न कही शासक वर्ग के रूप में रहे हैं। इन्ही छत्तिस कुल में से एक सेंगर राजपूत का कुल हैं।

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Pages:151-155
How to cite this article:
डाॅ0 सुमन तिवारी "बघेलखण्ड के सेंगरों का सांस्कृतिक अनुशीलन". International Journal of Multidisciplinary Research and Development, Vol 4, Issue 10, 2017, Pages 151-155
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