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VOL. 3, ISSUE 6 (2016)
कबीर वाणी से मधुुशाला तक जीवन दृष्टिकोण
Authors
Dr. Rafik
Abstract
हिन्दी साहित्य जगत में अद्वितीय स्थान रखने वाले कबीर का नाम संत कवियों में अपितु, हिन्दी-साहित्य जगत में बेजोड़ है। यद्यपि कबीर जी ने ‘‘मसि कागद छुयै नहिं, कमल नहिं हाथ’’ यह सत्य है कि कबीर जी ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे किन्तु उनके द्वारा कही गई वाणी को उनके अनुयायियों व शिष्यों द्वारा संकलित किया गया है। उनकी वाणी से अनंत बातें कही गई है। जिस प्रकार वनस्पति में जितने पत्रा एवं गंगा में जितने बालु उठा है, कबीर द्वारा भी अपनी मुख से उतना ही कहा गया है। हरिवंशराय बच्चन का सम्पूर्ण जीवन ही काव्यमय रहा है। उनका मानना है कि कविता हृदय की वस्तु है, बुद्धि की नहीं। जो भावना से उद्वेलित होकर रचा जाता है वही ‘साहित्य’ कहलाता है। भावानाओं को व्यक्तिगत सीमाओं से स्वतंत्रा करने के लिए ही कविता लिखी जाती है।1 ‘‘जैसा मैं हूँ वैसी ही मेरी अभिव्यक्ति है। मैं यह कहने नहीं जाता कि मैं दूसरों से कितना भिन्न हूँ, कितना उनके समान हूँ, मैंने जीवन में क्या अपनाया है, क्या छोड़ा है, कैसा मेरा रहन-सहन है, बोल-चाल है, बात व्यावहार है, क्या मेरे श्रेय-प्रेय हैं, जो मेरे चारो तरफ है उनसे मैं क्या पाना चाहता हूँ, उनसे अपने किन विचार भावों का आदान-प्रदान करना चाहता हूँ। अंग्रेजी में कहना चाहूँगा ‘आई लीव धेम’। मैं यह सब बर्तता हूँ, इन सब चीजों का सम्मिलित नाम है मेरी अभिव्यक्ति। यदि मैं इस समाज के बीच अपने लिए कोई अभिरूचि जगा सका हूँ तो मेरी अभिव्यक्ति भी जगाए।’’2
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Pages:361-365
How to cite this article:
Dr. Rafik "कबीर वाणी से मधुुशाला तक जीवन दृष्टिकोण". International Journal of Multidisciplinary Research and Development, Vol 3, Issue 6, 2016, Pages 361-365
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