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VOL. 3, ISSUE 10 (2016)
सांझी
Authors
नीतू खतरी, डाॅ0 बी0 एस0 गुलिया
Abstract
शेली के अनुसार: ‘‘कला, कल्पना की अभिव्यक्ति है।’’ कलाकार द्वारा कल्पित रचना कलाकृति कहलाती है। कलाकृति में भावों की अभिव्यक्ति निहित रहती है। कला में रेखाओं का विशेष महत्व होता है। भारतीय रेखाओं में बाहृय सौन्दर्य के साथ-साथ गम्भीर से गम्भीर भाव भी बडी़ कुशलता से व्यक्त किए जाते हैं। इनके द्वारा गोलाई, स्थिति व परिपेक्ष्य आदि सब कुछ प्रदर्शित किया गया है। कला के द्वारा मानव के मस्तिष्क की उपज व कल्पना शक्ति को चित्रभूमि उतारा जाता है। इस तरह के अभिव्यंजित क्रिया-कलाप कलाकृति की अर्ध गरिमा को परिभाषित करते हैं। मानव मन की मूल-भूत उपज व उसके द्वारा किये गये कार्य को कल्पना के माध्यम से चित्रभूमि पर स्वरूपवद्ध किया जाता है।
यद्यपि लोक कलाकारों को कला के सिद्धांतों का ज्ञान नहीं होता, फिर भी उनकी कलाकृतियां बड़ी रूचीकर एवं मनमोहक होती है। धरती के कण-2 में यह कला लोकजीवन में पूरी तरह रच गई है।लोक जीवन का कोई पहलू इससे अछूता नहीं है।
लोक कला में धर्म कूट-कूट कर भरा हुआ है। धर्मानुप्राणित होने के कारण लोक कला में अध्यात्मिक शक्ति का समावेश है जिसके कारण सराज में इसे आदर, भाव, श्रद्धा तथा उपासना की दृष्टि से देखा जाता है।
जीवन में भय की भावना का मानव के लिए महत्वपूर्ण अर्थ रहता है। जिसके कारण लोक कला के माध्यम से देवी देवताओं के प्रतीको की पूजा की जाती है। जिसके कारण हरियाणा भारतीय संस्कृति की विकास भूमि के रूप में प्रसिद्ध है। आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से शारदीय नवरात्रि आरम्भ होते हैं और इन दिनों कन्याएं दीवार पर मानव आकार की सांझी तैयार करती है। इसे दुर्गा मानकर पूजा की जाती है।
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Pages:222-224
How to cite this article:
नीतू खतरी, डाॅ0 बी0 एस0 गुलिया "सांझी". International Journal of Multidisciplinary Research and Development, Vol 3, Issue 10, 2016, Pages 222-224
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