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VOL. 2, ISSUE 1 (2015)
मैत्रेयी पुष्पा के ‘चाक’ में विमर्शवादी मीमांसा की संकल्पना
Authors
डाॅ0 किरण ग्रोवर
Abstract
सच्चा साहित्यकार अपनी वैयक्तिकता को पिघला कर उसे समाजीकृत रूप में प्रस्तुत करता है। साहित्य के सन्दर्भ में विमर्शवादी मीमांसा की संकल्पना आधुनिक काल की देन है। विमर्श ही समकालीन उपन्यासों की शक्ति है। मैत्रेयी पुष्पा जी ने विमर्शवादी अवधारणा के अन्तर्गत उत्तर आधुनिक विमर्श, स्त्री विमर्श, शिक्षा विमर्श, सेक्स विमर्श का प्रभावशाली चिन्तन अपने ‘चाक’ उपन्यास में किया है। मैत्रेयी पुष्पा के चाक उपन्यास में विमर्श के विभिन्न पहलुओं में उत्तर आधुनिकता के लक्षणों का विस्तार, सारंग के व्यवहार में नारी विमर्श का आक्रामक कदम, सैक्स विषयक बन्धनों से जीवन में तनावपूर्ण स्थिति, स्कूलों को राजनीति का केन्द्र, मूल्यजीवी अध्यापकों से दुव्र्यवहार आदि में विमर्शमूलक वैचारिकता की प्रस्तुति मिलती है। संवेदनशील पाठक जीवन विकास की दिशाओं को पा कर उत्कर्ष का रास्ता खोजने की दृष्टि भी प्राप्त कर सकता है।
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Pages:406-408
How to cite this article:
डाॅ0 किरण ग्रोवर "मैत्रेयी पुष्पा के ‘चाक’ में विमर्शवादी मीमांसा की संकल्पना". International Journal of Multidisciplinary Research and Development, Vol 2, Issue 1, 2015, Pages 406-408
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