International Journal of Multidisciplinary Research and Development


ISSN Online: 2349-4182
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Vol. 3, Issue 12 (2016)

उन्नीसवीं एवं बीसवीं शताब्दी: बघेलखण्ड की प्रमुख शिक्षण संस्थाएँ

Author(s): विनोद कुमार पटेल
Abstract:
मानव जीवन में शिक्षा का सर्वोत्तम स्थान है क्योंकि शिक्षा के प्रभाव से ही हम मानव मात्र के कर्तव्याकर्तव्य के नियमों को जानकर सदाचरण करते हैं। इस आचरण का ज्ञान हमें शिक्षा से ही प्राप्त होता है। शिक्षा से संस्कार और संस्कार से आचरण, आचरण से विनम्रता प्राप्त होती है। विनयशीलता ही शिक्षा का फल है। भारतीय ऋषियों का यह उद्घोष है कि विद्या से अमृतत्व की उपलब्धि होती है। एवं अविद्या से बन्धन की प्राप्ति होती है। इस शाश्वत शास्त्रीय तत्व को हृदयंगम करने वाले ऋषियों ने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूप पुरुषार्थ चतुष्टय की प्राप्ति के लिए अन्य अनेक अनुष्ठानों के पूर्व शिक्षा पर विशेष बल दिया है क्योंकि ‘‘संस्कारदोषादिन्द्रियदोषाच्च अविद्या’’ संस्कार दोष और इन्द्रिय दोष के कारण अविद्या उत्पन्न होती है। अविद्या से अभिभूत होकर मनुष्य अनेक प्रकार के पापों की ओर प्रवृत्त होता है।
वस्तुत शिक्षा क्या है इस के उत्तर में कहा जा सकता है कि अविद्या जन्य पतनोंन्मुखी मानव के विकारों को दूर कर धार्मिक प्रवृतियों की ओर अग्रसर करने वाली विचार शक्ति ही शिक्षा है। शिक्षा की सफल अभिव्यक्ति पुरूषार्थ चुतष्टय की उपलब्धि है। पुरूषार्थ चतुष्टय से मानव के व्यक्तित्व का विकास ही भारतीय शिक्षा का प्रयोजन है।

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