International Journal of Multidisciplinary Research and Development


ISSN Online: 2349-4182
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Vol. 2, Issue 10 (2015)

हिन्दी उपन्यासों में विवेचित सांस्कृतिक राष्ट्रवादी मूल्यों पर मंडराता खतरा

Author(s): डाॅ0 किरण ग्रोवर
Abstract: भारत की संस्कृति पर आर्थिक भूमंडलीकरण और परम्परा के प्रति बढ़ता मोह द्वन्द्वात्मक संघर्ष का रूप ले रहा है। दरअसल सांस्कृतिक घुसपैठ के दो लक्ष्य होते हैं एक तो है बाजार संस्कृति को फैलाकर उपभोक्तावादी संस्कृति को बढ़ावा देना तथा दूसरा सांस्कृतिक एकता को नष्ट करना। पाश्चात्य संस्कृति थोपने की साजिश सांस्कृतिक वर्चस्ववाद को जन्म दे रही है। इससे भारतीय संस्कृति के आर्थिक और सांस्कृतिक पक्ष को कुचला जा रहा है। भूमंडलीकरण ने देश प्रेम जैसी भावना के साथ भी खिलवाड़ किया है तथा भूमंडलीकरण की संस्कृति एकता के मूल पर अपना आतंक फैला रही है। सम्पूर्ण देशों में अलगाव की समस्या सांस्कृतिक संकट पैदा कर रही है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और भूमण्डलीकरण के फलस्वरूप सांस्कृतिक मूल्यों का क्षरण देखकर साहित्यकार आतंकित हो उठते हैं जिसके विरोध में उपन्यासों में अपनी आवाज बुलन्द करके संास्कृतिक मूल्यों के प्रतिरोध में मानवीय सम्बन्धों को प्रश्रय देते हैं तथा पारिवारिक सम्बन्धों की अहमियत को पुरानी पीढ़ी की आंखों से परखने का प्रयास भी करते हैं जिनमें कमलेश्वर, प्रियंवद, भगवान सिंह, अलका सरावगी, रवीन्द्र वर्मा, मंजूर एहतेशाम का योगदान अप्रतिम बन पड़ा है जिन्होंने पुरानी पीढ़ी व नई पीढ़ी के अन्तर, समाज की अराजकता, मानवीय रिश्तों और मानवीयता की भावना पर कुठाराघात, मानव की अस्मिता और स्वत्व को छीनना, अपसंस्कृति का फैलाव, राजनीतिज्ञों के देश प्रेम पर व्यंग्य करके संास्कृतिक मूल्यों पर मंडराते खतरे से पाठकों को सजग करने का प्रयास किया है, जोकि इस पत्र का निहितार्थ है।
Pages: 242-245  |  1127 Views  492 Downloads
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